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युर्वेद चिकित्सा करने वाले चिकित्सको के लिए उपयोगी सामान्य सूचना

by: Dr. Vinesh soni Published on27-10-19 01:50 PM
आयुर्वेद चिकित्सक अपनी प्रैक्टिस के दरमियान निम्न नियमों का पालन करें तो आपको किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होगी :-

* हमेशा रोगी की प्रकृति ,औषधि के गुण देशकाल एवं रोगों की प्रकोप अवस्था के आधार पर चिकित्सा क्रम करना चाहिए 
जैसे कफ प्रकृति रोगी के लिए हितकर औषधियां पित्त प्रकृति रोगी को समान रोग होने पर भी हानि पहुंचाती है

* देश एवं काल भेद से भी औषधिय योजना में युक्ति पूर्वक परिवर्तन किया जाता है जैसे कड़वी दवाइयां ले सकने वाले रोगियों के लिए पुड़िया -क्वाथ -और शहद के साथ योग शीघ्र लाभदायक रहते हैं जबकि उसी औषधियों का कैप्सूल /टेबलेट /सिरप फोरम कड़वी दवाइयां ना ले सकने वाले रोगियों व बच्चों के लिए स्टैण्डर्ड रोगियों के लिए चिकित्सा में प्रयुक्त करें तो फायदेमंद रहता है
 *इसी प्रकार
वत्सनाभ प्रधान औषधि शीतांग ज्वर, विसूचिका और हृदय की धड़कन में नहीं देनी चाहिए क्योंकि  वत्सनाभ शरीर की उष्णता को शीघ्र और श्वेत लाकर कम करता है और हृदय को शीतल बनाता है इसलिए रोगी को जहां तक संभव हो ना देवे 

*कुचला नए तीक्ष्ण वात प्रकोप के समय हानीकारक है  लेकिन पुरानी वातव्याधि में हितकर रहता है 

*पारद मिश्रित औषधि सगर्भा स्त्री /दुर्बल /किडनी में शोथ(अन्य  किडनी डिजीज)/ पांडु और कंठमाला के रोगी को कम अनुकूल रहती है 
*श्रृंग भस्म वात जन्य शुष्क कास में हानिकर है लेकिन कफ प्रधान कास, श्वास और निमोनिया आदि रोगों में हितकर है 

*लोह भस्म युक्त औषध रक्तआर्श और रक्ताअतिसार के आरंभ में हानिकर है 
लेकिन रक्त बंद होने के बाद में रक्त की कमी में दिया जा सकता है
 इसी प्रकार एनीमिया या रक्त वृद्धि और पुष्टि के लिए भोजन के बाद देना विशेष हितकारी है

 *एलुवा वाली औषधियां विशेषता रात्रि को सोने के समय दी जाती है परंतु सगर्भा स्त्री को नहीं देनी चाहिए
*इसी प्रकार बालसुधा युक्त या त्रीव रस भस्म युक्त मेडिसिन सगर्भा स्त्री को नहीं देनी चाहिए

*शोथहर औषधियों के प्रयोग काल में नमक शराब मांसाहार किया जाए तो औषधियों से पूर्ण लाभ नहीं होता है 

*कुछ औषद्धियां दीर्घकाल तक प्रतिदिन सेवन करने पर धीरे-धीरे शरीर में संचित होती रहती है जैसे पारद -सोमल -कुचला आदि इन औषधियों का सेवन लंबे समय तक करना हो तो थोड़े थोड़े दिन के अंतराल के साथ देनी चाहिए

 *चूर्ण और वटी आदि औषधीयों की अपेक्षा आसव अरिष्ट अर्क कवाथ आदि औषधियां जल्दी शोषित होकर शीघ्र लाभकारी होती है

*आमाशय में आहार होने की अपेक्षा आमाशय खाली होने पर औषधि का शीघ्र पाचन और शोषण होकर शीघ्र लाभ पहुंचाती है
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